भक्ति भोले ग्वाले की पार्ट ३

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कथा भाग –३ 
ग्वाले की भक्ति पार्ट
 –३ 

उसने अंदर जाकर देखा उस बालक के गले मैं जो मुक्ता मणि की माला थी वह माला टूट चुकी थी उसके मुक्ते यहाँ वहां बिखरे पड़े थे उसने आगे देखा कि वह बालक कुछ स्त्रियों  के साथ पागलों की तरह नाच रहा है न उसे तन का होश है न और किसी बात का, ग्वाले ने चुप चाप मुक्ता अपने सर पर बंधे कपडे में एकत्रित करना चालू करदिया और वो बालक उसी तरह उन स्त्रियों के साथ नृत्य करने में लगा रहा, जब ग्वाले ने सारे मुक्ता मणि अपने कपडे में बांध लिए तो उसने बालक को सम्बोधित किया “बालक अगर आपका खेल पूरा हो चुका हो तो चलें ? वैसे भी अब गोसाईं जी के आने से पहले हम वहां नहीं पहुँच सकते” जैसे ही उसकी आवाज सभी के कानों में पड़ी एक अजीब से ख़ामोशी वहां छा गई, इतनी ख़ामोशी की एक सुई भी अगर गिरे तो उसकी भी आवाज सपष्ट सुनी जा सके सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे तभी बालक ने मुस्कुराते हुए कहा “ये हमारे ग्वाला भाई हैं जो राजा के मंदिर की रखवाली करते हैं आज अगर मैं आप लोगों के बीच आ सका तो केवल इनकी बजह से इन्होने मुझे यहाँ आने में सहायता की है” किन्तु उन स्त्रियों के चेहरे से विस्मृतता के भाव अभी भी सपष्ट देखे जा सकते थे, 

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  • Read Part Ist:      भक्ति भोले ग्वाले की पार्ट १ 

बालक समझ चुका था कि ग्वाले से कितनी बड़ी भूल हो चुकी है, किन्तु बालक ने बात को बदलते हुए कहा “अच्छा सखियों फिर इसी दिन आपसे भेंट होगी अभी तो मुझे ग्वाला भाई की नौकरी बचानी है” और ये कह कर ग्वाले के साथ मंदिर के लिए निकल पड़े मंदिर के रास्ते में ग्वाला बालक की चाल की तेजी के हिसाब से नहीं चल पा रहा था और विस्मित होकर बालक को देख रहा था बालक बीच बीच में बोलता “ग्वाला भाई जल्दी चलिए” किन्तु ग्वाला चाह कर भी बालक जितनी तेज नहीं चल पा रहा था ग्वाला झल्ला कर बोला “मैंने पहले ही आपसे कहा था समय का ध्यान रखना किन्तु आपने मुझे किसी कार्य का नहीं छोड़ा अब हम कितना भी तेज चलने का प्रयत्न करें हम वहां गोसाईं के आने से पूर्व नहीं पहुँच सकते” ग्वाले की बात सुन कर बालक मुस्कुरा कर बोला “ग्वाल भाई आपने आते समय मुझे अपने कंधे पर बैठा लिया था अब आप एक काम करिये मेरे कंधे पर बैठ जाइये” यह सुनकर ग्वाला बड़ी तेज हँसने लगा और बोला “बालक आप भी खूब ठिठोली कर लेते हो यहाँ मेरे रोजगार पर बनी है और आप उपहास में लगे हो”  इतना सुन कर बालक ने कहा “ग्वाला भाई समझो ये समय व्यर्थ के संवाद करने का नहीं है आप मेरे कंधे पर बैठ जाओ” लेकिन ग्वाला कहाँ सुनने वाला था अतः बालक ने जबरन ग्वाले को अपने कंधे पर उठा लिया और बोला “ग्वाल भाई आँखे बंद करो” ग्वाले ने अपनी आँखे बंद कर ली, मंदिर में घंटे की ध्वनि ने ग्वाले की आँखे खोली गोसाईं जी रोज की भांति मंदिर का घंटा बजा रहे थे ग्वाला मंदिर के घंटे की ध्वनि सुन कर दौड़ता हुआ अंदर आया और उसने गोसाईं जी को एक तरफ धक्का दे दिया और चिल्ला कर बोला “ये क्या कर रहे हो आप” गोसाईं ग्वाले की इस हरकत से अचंभित से खड़े होकर ग्वाले को घूरने लगे उन्हें सपने में भी ऐसा आभास नहीं था की ग्वाला ऐसा भी करेगा गोसाईं जी क्रोधित हो कर बोले “ये क्या हरकत है ग्वाले कोई सपना देखा है क्या ?” अभी जब में द्वार खोलने आया था तो तुम गहरी नीद में सोये हुए थे, और अब ये क्या कर रहे हो ग्वाला बोला “मैं सोया नहीं था वो तो यहाँ जो बालक रहता है उसने मुझे आँख बंद करने के लिए बोला था” गोसाईं ग्वाले की बात पर हँसने लगे और फिर घंटे की तरफ चल दिए और बोले ग्वाला “प्रातः आरती का समय निकला जा रहा है मुझे आरती करने दो” लेकिन ग्वाला कहाँ मानाने वाला था उसने गोसाईं को फिर घंटा बजाने से रोक दिया और बोला “अगर आपने घंटा बजाय तो मुझसे बुरा कोई न होगा और मेरी लाठी देखी है” ये सुन कर गोसाईं जी भी क्रोध में आ गए और बोले “क्या पागल हो गए हो ग्वाले ? सदियों पुरानी रीत तोड़ दूँ तुम्हारी नादान हरकत की बजह से कोई विवेक वाली बात करो ग्वाले” ग्वाला बोला “अरे गोसाईं जी ये बालक पूरी रात निधिबन में रहा है यहाँ से पैदल पैदल गया वहां पागलों की तरह स्त्रियों के साथ नाचा और जब यहाँ आने में बिलम्ब हो रहा था तो यह मुझे अपने कंधे पर बिठा के यहाँ लाया वो भी अभी कुछ देर पहले ही ये थका हारा आया है इसको आराम तो करने नहीं दे रहे और घंटा बजा कर शोर और कर रहे हो, खबरदार जो घंटा बजाया गोसाईं जी आपने “ ग्वाले की बात पर गोसाईं जी बहुत जोर से हँसे और बोले “ग्वाले तुम बहुत भोले हो क्या मूर्ति भी कहीं जा सकती है ?नाच सकती है ? तुमने कोई सपना देखा होगा जब मैं आया था तो तुम बेसुध होकर सो रहे थे मैंने तुमको जगाना उचित नहीं समझा और पट के ताले खोल कर अंदर आ गया जाओ जाकर आराम करो ग्वाला बोला” “अच्छा तो आप ऐसे नहीं मानेगे” ग्वाले ने गोसाईं जी से पूँछा गोसाईं ने कहा “नहीं” “तो ठीक है आप एक छण रुकिए” कह कर ग्वाला दरबाजे की तरफ लपका और अपना वो ही कपडा जिसमें उसने वो बिखरे हुए मुक्ते एकत्रित किये थे ले आया और बोला “ये देखो प्रमाण, ये उसी हार के मुक्ते हैं जो निधिबन में बालक के गले से टूट कर बिखर गए थे मैंने एकत्रित किये हैं” गोसाईं को एक पल को तो लगा की उसके प्राण ही नहीं हैं वह किकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा ग्वाले को देख रहा था और कभी उन मुक्तों को जो ग्वाले के कपडे में थे। फिर एक साथ गोसाईं जी ने  मूर्ति की तरफ दौड़ लगा दी और देख कर वहीँ बैठ गये मूर्ति के ऊपर से मुक्ता मणि की माला सच में गायब थी उसकी समझ मैं ये नहीं आ रहा था कि इस बात पर वो रोये या हँसे, गोसाईं ने अपने जीवन भर उन्ही प्रभु की सेवा की थी किन्तु कभी भी प्रभु के चमत्कार उसको देखने को नहीं मिले,
 और एक ग्वाला है उसे वो ही प्रभु दर्शन दे रहे हैं, उसके साथ बात कर रहे हैं, उसके लिए भोजन का प्रबन्ध कर रहे हैं, उसे कंधे पर बिठा रहे हैं। 
गोसाईं रोता हुआ आया और उसने ग्वाले के चरण पकड़ लिए और बोला मुझे अपनी शरण में ले लो और ग्वाला विस्मृत सा गोसाईं जी को देखे जा रहा था, आगे का सारा जीवन गोसाईं जी ने ग्वाले की सेवा करते हुए निकला और ग्वाला और गोसाईं दोनों को बैकुंठ की प्राप्ति हुई। 
बोलो राजाधिराज श्री बांके बिहारी लाल की जय 
था पूर्ण हुई इससे क्या ज्ञान प्राप्त हुआ प्रबुद्ध जान कमेंट में जरूर बताएं 
bhaktikathain@gmail.com 

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जयश्रीराम 
Astrology And Falit Jyotish

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