काल की गति

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काल की गति

तुलसी जस भवतव्यता तैसी मिले सहाय ,
आप न आवे ताहि पे ताहि तहाँ ले जाए। 


अर्थात : तुलसी दास जी कहते हैं कि काल की गति को कोई नहीं रोक सकता जैसी होनी होती है उसी प्रकार होती है काल या तो चल कर प्राणी के पास आ जाता है और अगर काल आ नहीं पाता तो विधान ऐसा बन जाता है कि प्राणी स्वतः काल के बसीभूत होकर काल के पास पहुँच जाता है। 
एक समय की बात है प्रभु श्री हरि विष्णु जी छीर सागर में विश्राम कर रहे थे और बहार पहरे पर गरुण जी विराजमान थे प्रभु के दर्शन के अभिलाषी यमदेव छीर सागर पहुँचे औपचारिक अभिवादन के बाद गरुण जी ने उनको श्री हरि विष्णु जी से मिलने की अनुमति दे दी गरुण जी के पास ही एक कबूतर अठखेली कर रहा था उस पर यमदेव की दृष्टि पड़ी तो यमदेव ने बड़े ही आश्चर्य भरी दृष्टि से कबूतर को देखा और जैसे ही कबूतर की दृष्टि यमदेव से मिली अठखेली करता हुआ कबूतर अचानक भयभीत हो गया यमदेव कबूतर को घूरते हुए छीर सागर में श्री हरि विष्णु जी के पास चले गए, कबूतर के अंदर भय देख कर गरुण जी ने कबूतर से पूंछा तुझको क्या हुआ ?” कबूतर विचलित स्वर में गरुण जी बोला हे पक्षी राज मैंने यम को देखा है” गरुण जी बोले “तो इसमें क्या है ? देखा तो मैंने भी है” कबूतर बोला “भगवन आप अमर हैं किन्तु साधारण प्राणी को यम के दर्शन होने का मतलब है अंत समय निकट है अब यमराज मुझे नहीं छोड़ेंगे” कबूतर की करुण वाणी सुनकर गरुण देव बहुत जोर से हँसे और बोले चलो में तुम्हारा ये भय समाप्त कर देता हूँ और ऐसा कहकर गरुण जी ने कबूतर को अपने पंजो में दबाया और मन की गति से उड़ चले और कई समुद्र और पहड़ियों को पार करते हुए एक विशाल पर्वत की एक कंदरा (गुफा) में लाकर कबूतर को छोड़ा और बहार से एक विशाल पत्थर लगाकर उस कंदरा का दरबाजा बहार से बंद कर दिया और वापस छीर सागर के बहार आ गए। 
 कुछ समय उपरांत यम, प्रभु के दर्शन कर बहार आये और वो इधर उधर देखने लगे, उन्होंने पाया कि अब कबूतर वहाँ नहीं है यह देख कर यम ने बड़े ही विस्मृत दृष्टि से गरुण जी की तरफ देखा और मुस्कुराने लगे गरुण जी ने आश्चर्यचकित होकर पूंछा “यम देव क्या हुआ ?” यम देव ने कहा “कुछ नहीं गरुण जी उस कबूतर को देख कर मन बहुत विचलित था अब शांति है” यह सुन कर गरुण जी ने व्यंगात्मक तरिके में कहा “आपको और शांति ?  आप तो अब विचलित होंगे आपका शिकार जो मैंने आपके हाथ से दूर कर दिया उसके प्राण जो बचा लिए” यह सुनकर यम देव हंसने लगे और बोले “गरुण जी मैं उस कबूतर को यहाँ देखकर बड़ा ही उलझन में था, मैं ये सोच रहा था कि उसकी मौत चंद पलों बाद कई समुद्र दूर एक कंदरा में बिल्ली का भोजन बनके होनी है और वह यहाँ बैठा था मैं उसको यहाँ देखकर अत्यंत चिंतिंत था कि वो अगर महीनों अपनी पूर्ण गति से उड़ेगा तब भी उस कंदरा तक नहीं पहुँच पायेगा इसी उलझन में मैं प्रभु के दर्शन भी भली प्रकार नहीं कर सका और अतिशीघ्र बहार आ गया आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने उसको वहां पहुंचा दिया” ऐसा सुनकर गरुण जी ने कहा “ऐसा नहीं हो सकता यमदेव” तो यमदेव बोले “न मनो तो चल कर देख लो” गरुण जी, यमदेव के साथ उसी कंदरा पर पहुंचे और दरबाजे पर लगा पत्थर हटाया और देखा कि कबूतर के पंख इधर उधर बिखरे पड़े हैं और उसके मृत शरीर को एक बिल्ली खा रही है और कबूतर के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं, यम बोले “हे पक्षीराज गरुण काल से कोई भी नहीं बच सकता हर प्राणी का अंत निश्चित है उसका अंत कब, कहाँ, कैसे होना है यह सब निश्चित है।
विधि के विधान से कोई भी खिलबाड़ नहीं कर सकता स्वयं त्रिदेव भी नहीं।  
जय श्री राम मित्रो  
आप कितना भी प्रयत्न कर लीजिये जब यम का समय आएगा तो काल की गति को कोई नहीं रोक पायेगा 
कोई लाख करे चतुराई करम का लेख मिटे न रे भाई 
कथा अगर अच्छी लगी हो तो कमेंट अवश्य करें। 
bhaktikathain@gmail.com

कथा 

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